सरकार की छवि की खातिर छवि पर प्रहार

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प्रसंगवश: राजेश सिरोठिया

नसबंदी के लक्ष्यों में लगातार पिछड़ते मध्यप्रदेश में मुहिम में तेजी लाने के सख्त कदमों के ख्रिलाफ सियासी बयानों से विचलित कमलनाथ सरकार ने अपनी छवि की खातिर मप्र हेल्थ मिशन डायरेक्टर छवि भारतव्दवाज को हटाकर अच्छा संदेश नहीं दिया है। छवि को हटाने से प्रदेश में वो तमाम अफसर प्रो-एक्टिव होकर काम करने से बचेंगे। अगर कोई कहे तो छवि ने ऐसा किया क्या था, जिसकी सजा उसे अपमानजनक तरीके से हटाकर दी गई? उन्होंनें पुरूष नसबंदी के मामले में पिछड़ते मध्यप्रदेश में नसबंदी के काम में तेजी लाने के प्रयास किए। मिशन डायरेक्टर के दफ्तर से पुरूष नसबंदी बढ़ाने के लिए प्रदेश के सभी कमिश्नर, कलेक्टर, क्षेत्रीय संचालक स्वास्थ्य सेवा, मुख्य चिकित्सा और जिला हेल्थ अफसरों ने नाम पत्र लिखकर चालू वित्त वर्ष में नसबंदी में आ रही कमी दूर करने के लिए पत्र लिखा गया। पहला पत्र 27 सिंतबर, दूसरा 20 दिसंबर 2019और तीसरा 7 जनवरी 2020 को भेजा गया। लेकिन जब नतीजा ढाक के तीन पात वाला रहा तो 11 फरवरी को अत्यंत महत्वपूर्ण पत्र जारी किया गया,जिसमें नसबंदी के काम में लेतलाली बरतने पर बहुउद्देशीय कार्यकर्ताओं के खिलाफ वेतन रोकने और सेवा से हटाने की चेतावनी भरे लहजे का इस्तेमाल किया गया। छवि आदेश जारी करके ट्रेनिंग पर हैदराबाद रवाना हो गईं। इधर जैसे ही हफ्ते भर में यह आदेश निचले स्तर पर पहुंचा मीडिया के जरिए सियासी बवाल खड़ा कर दिया गया। कहा गया कि प्रदेश में आपातकाल वाले दिनों की नसबंदी के दिन आ गए हैं। भाजपा के कुछ नेताओं ने तो नसबंदी के हिंदु मुसलमान से जोडऩा शुरू कर दिया। बस फिर क्या था। आलोचना से विचलित सरकार ने ताबड़तोड़ फैसला करते हुए छवि भारव्दवाज को एक झटके में मिशन डायरेक्टर को हटा दिया और प्रभारी मिशन डायरेक्टर से 11 फरवरी के पत्र को वापस ले लिया। गौरतलब तो यह है कि मात्र आलोचना होने पर ऐसा कदम उठाने से पहले किसी ने पत्र को ध्यान से ही नहीं पड़ा। पत्र का मजमून यदि नाथ सरकार का कोई कारिंदा ध्यान से पढ़ लेता तो शायद सरकार को अपनी छवि के नाम पर छवि को हटाने का फैसला नहीं करना पड़ता। पत्र में साफ लिखा गया है कि प्रदेश में पुरूष नसबंदी की दर मात्र 0.5 फीसदी है। 2015-16 से इसमें लगातार कमी आ रही है। बहुउद्देशीय कार्यकर्ता और हेल्थ सुपरवाईजर नसबंदी के इच्छुक लोगों (जबरिया नहीं) को नसंबदी कराने के लिए प्रेरित नहीं कर रहे हैं। कई कर्मचारी ऐसे हैं जिन्होंने इस साल के साल के दौरान एक भी व्यक्ति को नसबंदी के लिए प्रेरित नहीं किया है।जबकि उन्हें साल से पांच से दस लोगों को नसबंदी कराने को प्रेरित करना था। पत्र में ऐसे स्वास्थ्य कर्मियों को चिंहिंत करने को कहा गया था जिन्होंने साल में एक भी नसबंदी नहीं कराई। उनका वेतन तब तक रोकने का आदेश दिया गया था जब तक कि वह चालू वित्त वर्ष में कम से कम एक नसबंदी नहीं करवा पाते। यानि वेतन रोकने का फरमान तुगलकी नहीं सशर्त था। साथ ही यह भी कहा गया किस जिन्होंने 20 फरवरी तक कोई काम नहीं किया है उनकी अनिवार्य सेवानिवृत्ति का प्रस्ताव मिशन दफ्तर को भेजा जाए। कुल मिलाकर यह सख्त पत्र पुराने पत्रों पर ध्यान नहीं देने को लेकर किया गया। इसमें असहज और असामान्य कुछ भी नहीं था, लेकिन छवि को हटाने से यह संदेश चला गया कि सभी अफसर चुपचाप शांति से जैसा चल रहा है वैसा चलने दें के मोड में हैं। यह ठीक नहीं है। आखिर राज्य का मिशन नेशनल हेल्थ मिशन के दिशानिर्देशों पर काम करता है। स्वास्थ्य और जनसंख्या नियंत्रण के कई पैमानों पर वह देश और प्रदेशों की तस्वीर सुधारना चाहता है। सवाल सिर्फ कमलनाथ और उनकी सरकार का नहीं है। नसबंदी पर बवाल खड़ा करने वाले अति उत्साही भाजपा नेता क्या यह भूल गए कि आबादी नियंत्रण के प्रति राज्य ही नहीं बल्कि केंद्र की सरकार भी बेहद चिंतित है। आबादी के विस्फोट के खतरों क्या वह पहचान नहीं पा रहे हैं? ऐसी सियासत से तो देश को भगवान ही बचाए जहां मात्र विरोध के लिए किसी भी मुद्दे पर सरकार की पगड़ी को उछाले और सरकार घुटने टेकते हुए अपनी छवि की चिंता में अफसरों की बलि चढ़ा दे।

rajesh-sirotia

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