मोटी मछली मालामाल , छोटे कारोबारी होंगे हलाल

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प्रसंगवश: राजेश सिरोठिया


एक अप्रैल से शुरू हो रहे वित्त वर्ष के लिए बनाई गई मध्यप्रदेश सरकार की आबकारी नीति पर शराब के कारोबार जे जुड़ी बड़ी और मोटी मछलियों को मालामाल करने वाली और छोटे शराब व्यापारियों को हलाल करते हुए कंगाली की ओर ले जाएंगे। नई शराब नीति मदिरा प्रेमी असंगठित उपभोक्ता वर्ग के जेबों पर भी भारी बोझ डालने की तैयारी है तो देशी शराब का सेवन करने वाले गरीब वर्ग खासतौर से गांवों और आदिवासी अंचलों में कच्ची शराब का प्रचलन बढऩे की आशंका को भी नहीं नकारा जा सकता।


कहने को तो नई शराब नीति में सरकार ने इस साल के मुकाबले पच्चीस फीसदी ज्यादा राजस्व जुटाने की जुगत भिड़ाई गई है। लेकिन अभी तक15 फीसदी की जिस सालाना वृद्धि पर शराब कारोबारी नाक भौं सिकोड़ते थे, वे 25 फीसदी ज्यादा पर कैसे राजी हो पाएंगे? अभी यह समझ में नहीं आ रहा है कि सरकार ने अपनी आमदनी बढ़ाने के लिहाज के नीति बनाई है या अपनों को उपकृत करने के लिए उनके मुताबिक नीति बनाई है। चार बड़े महानगरों में केवल दो ग्रुप यानि शराब कारोबार की बड़ी मछलियों के लिए पूरी गुंजाईश बनाई गई है।


इंदौर, भोपाल, जबलपुर और ग्वालियर में शहरी और ग्रामीण अंचल के ग्रुप बनेंगे। यानि भोपाल के अरोरा बंधु, इंदौर के पिंटू भाटिया, जबलपुर के बिट्टू सहगल, रायपुर के पप्पू भाटिया तथा ग्वालियर के लल्ला शिवहरे ग्रुप की लाटरी खुलना तय है। इसके विपरीत बाकी 14 नगर निगम वाले जिलोंं में पूरी दुकानों का एक ही ग्रुप बनाया जाएगा। यानि पूरी तरह से किसी एक ग्रुप का एकाधिकार इन नगर निगम क्षेत्रों में हो जाएगा। 36 नगर पालिका क्षेत्रों वाले जिलों में नेताओं की पसंद के कारोबारियों की राह खुली रखी गई है। यदि वो चाहें तो 25 फीसदी ज्यादा लायसेंस फीस चुकाकर अपनी मौजदा दुकानों को बचाए रख सकते हैं।


इससे गुना के भजन सेठ सरीखे शराब कारोबारी की सल्तनत में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकेगा। लेकिन शराब दुकानें चला रहे छोटे कारोबारियों के प्राण सुखाने का पूरा इंतजाम इस पालिसी में किया गया है। यदि वो 25 फीसदी ज्यादा की रकम भरकर दुकान को अगले साल भी चालू रखते हैं तो दस फीसदी वैट टेक्स के साथ 35 फीसदी के मार्जिन के खात्मे के बाद कमाने की गुंजाइश बेहद कम रह जाएगी। यानि वह धीरे-धीरे हलाल होते हुए कंगाली को प्राप्त होंगे। जो 25 फीसदी की बढ़ोत्तरी पर सहमत नहीं होंगे, वो कारोबार से या तो बाहर हो जाएंगे या फिर बड़ी मछलियों की दुकानों में छोटे मोटे मुनाफे खातिर निवेश करने को मजबूर हो जाएंगे, लेकिन सरकारी कागजों से उनका अस्तित्व विलुप्त हो जाएगा। बड़ी आय की उम्मीदें लगाए बैठी सरकार शराब के कारोबार में एकाधिकार का खामियाजा 2001 में भी भुगत चुकी है जब उसकी शराब से आय बढऩे के बजाए घट गई थी। इस नीति में इस खतरे की पुनरावृत्ति के सारे तत्व दिखाई दे रहे हैं।

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