हिंसा का ये कश्मीर मॉडल दिल्ली कैसे आया?

0
3404

प्रसंगवश: राजेश सिरोठिया


नागरिकता संशोधन कानून संसद में पारित होने के बाद विपक्षी दलों ने झूठ , प्रपंच और अफवाहों के जिन्न का जो प्रोपेगंडा रचा वह जिन्न अब हिंसक होने के साथ ही धार्मिकता की खोल ओढऩे लगा है। जिन दलों ने मोदी-शाह और भाजपा को घेरने के लिए इस जिन्न को बोतल से बाहर निकाला था, वह अब उनके काबू से बाहर हो चला है। भारत में विदेशी राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्री के दौरे के वक्त कश्मीर में हिंसा की वारदातें करके कश्मीर समस्या का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने की जो कोशिशें मुस्लिम बहुल घाटी में होती थीं , उस कश्मीरी मॉडल का दिल्ली में मंचन बेहद चिंताजनक है।


शाहीन बाग के अहिंसक आंदोलन का ट्रंप की यात्रा के दौरान जाफराबाद शिफ्ट होना और हिंसक आंदोलन में उसकी तब्दीली कोई साधारण घटना नहीं है। यह एक बड़ी साजिश है। शाहीन बाग पर लाखों लोगों की रोजमर्रा की परेशानी की कीमत पर चल रहे अहिंसक आंदोलन चलाने वालों को सरकार के थका देने वाले रवैये से अंदाजा हो गया था कि ऐसे विरोध से बात बनने वाली नहीं है। इसी के चलते शाहीन बाग आंदोलन के स्वरूप को शांतिपूर्ण बनाए रखते हुए जाफराबाद में कश्मीर मॉडल को अपनाया गया।


भाजपा नेता कपिल मिशा ने जाफराबाद के आंदोलनकारियों को तीन दिन की जो मोहलत दी, उससे साफ हो गया कि पुलिस ट्रंप की यात्रा के बाद सक्रिय होगी। सीएए समर्थक भाजपा और पुलिस के इस तरह तीन दिन तक हाथ बांधे रहने की विवशता ने हिंसा फैलाने वालों को अपना खेल खेलने का खुला मौका दिया। तभी तो शाहदरा के डिप्टी पुलिस कमिश्नर अमित शर्मा को हिंसक भीड़ के हमले से बचाते -बचाते हेड कांस्टेबिल रतन शर्मा की मौत हो गई लेकिन पुलिस गांधीगिरी दिखाती रही और भीड़ के हाथों पिटती रही। एक युवक खुले आम पिस्तोल चलाता रहा और पुलिस उसे डंडा दिखाकर रोकने की नाकाम कोशिश करती दिखी। सवाल यही उठता है कि दिल्ली पुलिस के हाथ भले ही बंधे थे , लेकिन क्या उसने अपने आंख ,नाक औक कान भी बंद कर रखे थे , जिसके चलते वह ट्रंप की यात्रा के दौरान हिंसा की साजिश को भांप भी नहीं सकी?


नागरिकता कानून की हकीकत तो समझे बगैर अनपढ़ों से लेकर पढ़े लिखे तथाकथित बुद्धिीजीवियों की जमात ने जो जहर बोया है वही भारत की धरती को लहुलुहान कर रही है। स्वरा भास्कर बगैर 2019 के सीएए या 1955 में संसद में पारित नागरिकता कानून को पढ़े बगैर कुतर्कों की फसल उगा रही हैं। उन्हें नहीं पता कि जिस एनआरसी का वह विरोध कर रहीं है उसका प्रावधान 1955 में नागरिकता कानून की धारा 14 और 14 ए में ही हो चुका है।


इसके तहत भारत के नागरिकों की पहचान करने के लिए नागरिकता अथॉरिटी बनाने और उसके व्दारा लोगों को नागरिकता का कार्ड देने की व्यवस्था की गई थी। लेकिन एनआरसी के इस प्रावधानों को न तो पंडित नेहरू ने लागू किया न इंदिरा गांधी ने या उनके बाद की सरकारों ने। मोदी सरकार भी इसको लेकर मना ही कर रही है, जिस पर लोगों को भरोसा नहीं हो रहा क्योंकि भाई अमित शाह संसद में कह चुके हैं कि सीएए के बाद एनआरसी लागू होगी। एनआरसी लागू हो या न हो इसके पक्ष या विपक्ष में तर्क या वितर्क हो सकते हैं, लेकिन क्या दूसरे देशों की तरह भारत को अपने देश में नागरिकता देने के प्रावधान करने का हक नहीं है?


बहरहाल कुतर्को पर आमादा लोग सब कुछ जानते हुए भी समझने को तैयार नहीं है और विरोध का बिगुल बजाए हुए हैं। लेकिन जब तक देश के संविधान के तहत लोकतांत्रिक तरीके आंदोलन हो तो उसे अभिव्यक्ति का अधिकर मानते हुए, ऐसा करने की पूरी इजाजत मिलना चाहिए। लेकिन अब मामला बेपटरी हो चला है तो विरोध को हवा देने वाले राजनीतिक दल अब कन्नी काटते दिख रहे हैं। जबकि भाजपा सहित सभी दलों को इस बात की चिंता करने की जरूरत है कि उनके कामकाज देश को किस दिशा में ले जा रहे हैं।


सीएए विरोधी और सीएए समर्थक दोनों को चाहिए कि वह संसद में पारित कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करें। सडक़ों पर उतरने से दोनों पक्षों(सीएए समर्थक और विरोधी) को सडक़ों पर उतरने और आपसे में भिडऩे से बचना चाहिए। क्योंकि इससे न तो कोई हल निकलने वाला है और न किसी को कुछ हासिल होने वाला है। हां जो खोएगा वह देश खोएगा। ऐसी हिंसा से देश में कारोबार से लेकर विदेशी पर्यटन भी प्रभावित होगा जिसका विपरीतअसर देश की इकॉनामी पर ही पड़ेगा।

Click Here To More News EPAPER DOPAHAR METRO

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here