दिल्ली की हिंसा को भला कैसे थामा जाए?

0
4477

प्रसंगवश:राजेश सिरोठिया


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप परिवार के भारत की सरजमीं पर कदम रखते ही दिल्ली की नासमझों की बस्ती से उपजी हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही। भडक़े दंगों में मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इस हिंसा के जरिए शाहीन बाग के आंदोलन कारियों ने सीएए और एनआरसी के मुद्दे पर अपनी पार्ट -टू योजना के लिए विश्व बिरादरी का ध्यान खींचने का जो जतन किया है, वह फिलहाल तो कामयाब होता नहीं दिखा रहा।


शाहीन बाग को नजरअंदाज करने की जो खीझ यमुना पार के जाफराबाद, मौजपुर , गोकुलपुरी जैसे इलाकों में निकली है, वह कहां जाकर रूकेगी इसका अंदाजा फिलहाल तो नहीं लगाया जा सकता। लेकिन इस पूरे मसले में कई ऐसे पेंच हैं जिनको सुलझाने के लिए देश भक्त मुस्लिम बुद्धिजीवियों को आगे आने की दरकार जरूर है। वही समझा सकते हैं कि किस तरह सीएए और एनआरसी के मुद्दे पर नासमझ लोगों को उनके वजूद का सवाल खड़ा करके भडक़ाया गया है। चैनलों पर चेंचे करते सीएए और एनआरसी के विरोधियों ने दिल्ली के गरीब , कम पढ़े लिखे और नासमझ मुस्लिम भाईयों और बहनों को बरगलाकर हिंसा करने और उसका शिकार बनने को विवश किया है?


यह बात इन लोगों को मुस्लिम स्कालर्स के अलावा भला और कौन समझा सकता है कि वामपंथी मुल्क अपने देश में इस्लाम को पाबंदियों में रखते हैं। इस्लामिक देश अपने मुल्क में वामपंथियों पर पाबंदी लगाकर रखते हैं। लेकिन भारत जैसे देश में यही वामपंथी इस्लामिक कट्टरपंथियों को साथ लेकर बवाल खड़ा कर रहे हैं। सीएए के कानून से भारत के मुसलमानों को तो कोई समस्या है ही नहीं। तो फिर क्यों भारत के मुसलमान चाहे अनचाहे भारत के नागरिकता कानून में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुसलमानों को भारतीय नागरिकता दिलाने के पैरौकार बन रहे हैं। क्या इस देश के हिंदु, मुसलमान या यहां रहने वाले किसी और समाज के लोग पाकिस्तान की नागरिकता का प्रावधान के लिए इमरान खान को बाध्य कर सकते हैं? शायद नहीं क्योंकि सभी जानते हैं कि जो भारतीय मुसलमान पाकिस्तान में रह रहे हैं, उन्हें पाकिस्तानी मुसलमान कतई कुबूल नहीं करते हैं। फिर वहां के मुसलमानों के लिए भारतीय मुसलमानों की दरियादिली का सबब क्या है?

Delhi-hinsa


सीधी सी बात है सीएए से भारतीय मुसलमानों का कोई नफा नुकसान नहीं है, लेकिन उन्हें भडक़ाकर पीएफआई जैसे देश विरोधी संगठन हिंदुस्तान के जजबाती लोगों की लाशों पर अपने स्वार्थ की रोटियां सेंक रहे हैं। सबको पता है कि धरना आंदोलनों में काफी पैसा खर्च होता है। यह खर्चा कहां से आ रहा है? कौन पैसे दे रहा है? इन पैसों से आखिर कितने दिन लोगों का भला होगा?


मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और कांग्रेस के शीर्षस्थ नेताओं में शुमार कमलनाथ जैसे वरिष्ठ नेता भी यह कह रहे हैं कि भारत में आतंकवाद देश के बाहर से आया है। क्योंकि भारत में कोई भी धर्म आंतक पैदा नहीं करता। कश्मीर में भी आतंक बाहर से आया। जाहिर है कि कमलनाथ जब हिंसा को लेकर अपनी चिंता साझा कर रहे हैं तो व्यवासियक पृष्ठभूमि से संबद्धता के चलते वह जानते हैं कि इस तरह की हिंसा और अराजकता से भारत में धंधे प्रभावित होते हैं। टूरिज्म घटता है। तरक्की का पहिया रूकता है। विदेशी पूंजी निवेश में भी अड़चन होती है। बरगलाए हुए लोगों को यही समझाना होगा कि देश को होने वाले नुकसान का खामियाजा इस देश के सभी लोगों को भुगतना पड़ेगा। फिर चाहे वह हिंदु हो या मुसलमान, सिख हों या कोई और बिरादरी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here