दिल्ली हिंसा: पुलिस के लिए बड़ी केस स्टडी

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दिल्ली हिंसा: पुलिस के लिए बड़ी केस स्टडी

प्रसंगवश: राजेश सिरोठिया

दिल्ली में हिंसात्मक दंगल थमने के बाद एक बार फिर राजनीतिक दल एक दूसरे पर तोहमत लगाने की होड़ में जुट गए हैं। कोई निकम्मेपन के लिए दिल्ली पुलिस को कोस रहा है तो कुछ लोग पुलिस के खुफिया तंत्र को दोष दे रहे हैं। कई ऐसे भी हैं,जो अमित शाह को नाकाम गृह मंत्री साबित करने पर आमादा है। लेकिन कोई भी यह समझने को तैयार नहीं है कि दिल्ली की हिंसा महज हिंदु-मुसलमान वाली हिंसा नहीं है।यह देश के खिलाफ हिंसा है। इसका मकसद सिर्फ किसी की जान लेने तक सीमित नहीं है। यह तरक्की करते भारत को एक अराजक देश में तब्दील करने की साजिश है। देश की बेपटरी होती अर्थव्यवस्था को तबाह करने का षडय़ंत्र है। जाफराबाद, मौजपुर, गोकुलपुरी आदि इलाके क्यों सुलगे?

नरेंद्र मोदी ने शाहीन बाग आंदोलन को लेकर कहा था कि यह कोई संयोग नहीं बल्कि प्रयोग है। लेकिन सच तो यही है कि शाहीन बाग एक थीसिस थी। वहां अहिंसा की नुमाइश थी। देश के संविधान के प्रति आस्था का प्रदर्शन था। तिरंगे के प्रति निष्ठा का इजहार था। भारत माता की जय और वंदे मातरम की गूंज लिए एक माहौल था। लेकिन किसी को नहीं पता था कि शाहीन बाग में तैयार थीसिस से बिल्कुल उलट जाफराबाद, मौजपुर, गोकुलपुरी में इस थीसिस के प्रयोग की इबारत लिखी जा रही है। जिस मात्रा में घरों की छतों से नुकीले पत्थर ईंटों के टुकड़े, पेट्रोल बम, गुलेल, और यहां तक कि तेजाब तक मिली है, वह कोई एकाएक नहीं हो गया। थीसिस को प्रयोग में तब्दील करने के लिए यह तैयारी लंबे समय से चल रही थी। इतनी गोपनीयता के साथ के किसी और को इसकी भनक भी न लग सकी।

आप पार्टी पार्षद ताहिर हुसैन भले ही बड़े मासूमियत भरे तर्क देकर अपने बचाव की चाहे कितनी कोशिश कर लें लेकिन उनके तर्क किसी के गले नहीं उतर रहे। दंगाई जबरन उनके घर मेंं घुसे और इतनी तैयारी कर डाली। ताहिर भाई का परिवार पहले ही अपने मकान से शिफ्ट हो गया। दंगाईयों ने उनकी छत का इस्तेमाल किया लेकिन उनके घर की किसी एक सुई को भी नहीं छुआ। सच तो यह है कि जाफराबाद के प्रयोग को देश के तमाम राजनीतिक दलों को समझना होगा। आपस में टीका टिप्पणी करके एक दूसरे को नीचा दिखाने वाली बयानबाजी देश को कमजोर करेगी और उन ताकतों को मजबूत करेंगी जो भारत में एक बड़ा प्रयोग करने की योजना लेकर बैठे हैं।शाहीन बाग के शाही विचारोंं के बाद उत्तर पूर्वी दिल्ली के गरीब और मझौले लोगों की बस्ती में हुए इस प्रयोग में कुछ लोग हिंसा की बलि चढ़े हैं तो कुछ लोग अब आगे जाकर पुलिस की जांच की जद में आने के बाद फडफ़ड़ाएंगे। लेकिन भारत को कमजोर करने वाले प्रयोगधर्मियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ऩे वाला।

इंसानियत के हो रहे कत्ल से उनका कोई वास्ता भी नहीं है। जिसको मरना हो मरे लेकिन काम हमारा पूरा करे। केंद्र सरकार ने दिल्ली हिंसा की जांच के लिए विशेष जांच दल गठित किया है, लेकिन वह साजिश के तारों को कितना और कहां तक बेनकाब कर सकेगा, यह भविष्य के गर्भ में है। लेकिन यह बड़ी केस स्टडी होगी। दिल्ली की हिंसा इस बात की ताकीद तो करती है कि किसी भी आंदोलन के पीछे के मकसद को समझे बगैर उसका समर्थन करना या झूठ का पहाड़ खड़ा करना देश की सेहत के लिए कितना उचित है और कितना अनुचित।

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