मध्यप्रदेश के सियासी बवाल का क्या है सबब ? राज्यसभा की रस्साकशी या ऑपरेशन लोट्स

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प्रसंगवश: राजेश सिरोठिया

मध्यप्रदेश में बीते तीन दिनों से जारी सियासी बवाल का आखिर क्या सबब है? यह राज्यसभा में जगह बनाने के लिए चल रही मध्यप्रदेश कांग्रेस के भीतर जारी अंदरूनी रस्साकशी है? प्रेशर पॉलिटिक्स है या कुछ और? या फिर यह माना जाए कि मध्यप्रदेश में भाजपा ने कर्नाटक के बाद ऑपरेशन लोट्स शुरू कर दिया है?


इस पूरी सियासी उधेड़बुन के ताने बानों पर गौर किया जाए तो लब्बोलुआब इन्हीं सवालों के इर्दगिर्द सिमटे नजर आ रहे हैं। नरेंद्र मोदी और अमित शाह को हर हाल में राज्यसभा में इस महीने होने वाले राज्यसभा के चुनाव में अपनी संख्या बढ़ानी है ताकि नुकसान को कम कर सके। यदि कागजी बात करें तो मध्यप्रदेश में राज्यसभा की दो सीटों जीतने के लिए कांग्रेस को जितने वोट (114) चाहिए उतन उसके पास हैं। यानि सपा बसपा के तीन और चार र्निदलीयों के बगैर ही कांग्रेस दो सीट आराम से जीतने की स्थिति में हैं। उधर भाजपा के पास 107 विधायक हैं। यानि राज्यसभा के एक सदस्य को जिताने के लिए जरूरी 57 वोट के अतिरिक्त उसके पास 50 विधायकों के वोट खाली हैं। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व नहीं चाहता कि मात्र सात विधायकों की कमी के चलते राज्यसभा की दूसरी सीट के लिए दावेदारी छोड़ी जाए। इसलिए भाजपा दूसरी सीट से ऐसे नेता को टिकट देने की रणनीति पर काम कर रही है, जिसके चलते कांग्रेस के वोट में सेंधमारी हो सके।

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अब बात कांग्रेस की अंदरूनी कलह और प्रेशर पॉलिटिक्स की। कांग्रेस के मक्का यानि दस जनपथ से छनकर आती खबरें यह इशारा कर रही हैं कि मप्र से राज्यसभा कोटे की दो सीटों में से एक पर सूबे के बाहर का और एक पर मध्यप्रदेश के किसी नेता को नवाजा जाए। मध्यप्रदेश के राजनीतिक संतुलन के तकाजे को देखें तो दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा के लिए मौका देकर इस गुत्थी को सुलझाया जा सकता था। लेकिन हाईकमान से इन नेताओं को संगठन की जवाबदेही सौंपने और राज्यसभा के लिए किसी और को मौका देने के संकेत मिलने के बाद प्रेशर पॉलिटिक्स का दौर शुरू हुआ। मंगलवार को हरियाणा के होटल में डेरा डालने वाले विधायक ऐंदल सिंह कंसाना को दिग्गीराजा का खांटी समर्थक माना जाता है तो रणवीर जाटव ज्योतिरादित्य सिंधिया के खास हैं। कंसाना अपने लिए मंत्री पद और दिग्विजय सिंह को राज्यसभा में मौका दिलाना चाहते हैं तो जाटव ने अपने नेता के लिए दवाब बनाया। लेकिन बगावत की हद तक जाने की नियत दोनों की ही नहीं थी, इसलिए वह थोड़ी सी मान मनौव्वल के बाद मान भी गए अब तीसरी बात भाजपा के आपरेशन लोट्स की।

भाजपा के अंदरखानों से आ रही खबरों पर यकीन करें तो यह देर आए पर दुरूस्त आए की दिशा में बढ़ते कदम हैं। 2018 के विधानसभा चुनावों में गुजरात के चुनाव की तरह संघर्ष करते करते भाजपा कर्नाटक जा पहुंची थी। यानि कर्नाटक की तरह बहुमत के आंकड़े से थोड़ा दूर जाकर छिटक गई थी। लेकिन कर्नाटक में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी थी और मध्यप्रदेश में कांग्रेस छह सीटें पीछे रहकर नंबर दो पर थी। शायद इसी के चलते भाजपा आलाकमान मध्यप्रदेश में कोई उठापटक के फेर में नहीं था। लेकिन अब जब राज्यसभा का मामला आया है तो आपरेशन लोट्स उसकी मजबूरी बन गया है। भाजपा के नेताओं का आकलन कांग्रेस के दस विधायकों के इस्तीफे का है। बाकियों समर्थन लेकर सरकार बनाने का मंसूबा है। लेकिन कांग्रेस भी हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठी है। भाजपा के दो विधायकों नारायण त्रिपाठी और शरद कोल को लेकर उसका दावा पुराना है, अब वह तीन और भाजपा विधायकों पर डोरे डालने का दावा कर रही है।


कुल मिलाकर अगला एक पखवाड़ा कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए जीवन मरण का प्रश्न बन गया है। सियासी चालें किसकी कामयाब होती है और पटखनी कौन खाता है, यह पूरा घटनाक्रम बेहद दिलचस्प होने वाला है।

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