कमलनाथ का कॉन्फिडेंस तो गजब का है

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प्रसंगवश:राजेश सिरोठिया


यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि सरकार बचाने के संकट से जूझ रहे सूबे के मुखिया कमलनाथ अपनी कोशिशों में कितना कामयाब हो पाएंगे,लेकिन नाथ और उनकी टीम का सरकार को बचाने और संकट को टालने का जज्बा गजब का है। ंिसधिया समर्थक 19 विधायकों सहित 22 कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे मिलने के बाद उनकी जगह कोई और नेता (दिग्विजय सिंह को छोडक़र) होता तो काफी पहले हथियार डाल देता। लेकिन नाथ हैं कि डटे हुए हैं। यही नहीं उनकी प्रशासनिक टीम भी पूरी तरह मुस्तैद है। जबकि ऐसे माहौल में सामान्य तौर पर नौकरशाह डांवाडोल सरकारों से कन्नी काटने लगते हैं। संकट को गहराए बीते दस दिनों से ज्यादा वक्त हो चुका है, लेकिन मजाल है कि नौकरशाह टस से मस हों। तबादलों का दौर बदस्तूर जारी है।
वह भी छोटे मोटे अफसरों का ही नहीं प्रदेश में पुलिस के नए मुखिया के तौर पर विवेक जौहरी चार्ज संभाल रहे हैं। यह जानते हुए भी कि राज्य सरकार ने केवल डीजीपी की नियुक्ति को लेकर अदालत बाजी से बचाने के लिए उनके नाम को यह सोचकर आगे रखा था ताकि कोई सीनियरिटी के सवाल पर प्रभारी डीजीपी राजेंद्र कुमार को नहीं घेरेंगे। सरकार सुनिश्चित थी कि उधर बार्डर सिक्युरिटी फोर्स सरीखी देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्ध सैनिक बल का मुखिया जौहरी पुलिस का मुखिया बनने भोपाल नहीं आएंगे। सरकार की इस मंशा का अंदाजा इसी बात से लगता है कि उसने जौहरी का आदेश तो डारी किया लेकिन उनकी सेवाएं केंद्र से वापस राज्य को सौंपने के लिए कोई औपचारिक अनुरोध दिल्ली नहीं भेजा। केंद्र सरकार की नियुक्ति संबधी कैबिनेट कमेटी ने गृह मंत्री अमित शाह के निर्देश पर जौहरी की सेवाएं आनन फानन लौटा दीं। लेकिन नाथ सरकार के हौसलों और कॉन्फिडेंस की बानगी देखिए, उसने भी ताबड़तोड़ कैबिनेट में फैसला करते हुए जौहरी का इसी साल सितंबर में खत्म होने वाला कार्यकाल दो साल बढ़ा दिया। यानि तू डाल-डाल मैं पात-पात।
बात पुलिस के मुखिया तक सीमित नहीं है। संकट के दौर में सुधी रंजन मोहंती को बदलकर अपने पुराने विश्वस्त साथी गोपाल रेड्डी को मुख्य सचिव बनाने का आदेश भी जारी हो जाता है और वह घंटे भर के भीतर ज्वाइन भी कर लेते हैं। चूंकि सीनियर होने के नाते मोहंती को मंत्रालय में नहीं रखा जा सकता इसलिए उनकी पोस्टिंग प्रशासन अकादमी कर दी जाती है। मोहंती 31 मार्च को रिटायर हो रहे हैं लेकिन एकाध दिन के भीतर उनको राज्य बिजली नियामक आयोग के अध्यक्ष के बतौर नियुक्ति के आदेश जारी हो जाएंगे।
इस संकट के साइड इफेक्ट का लाभ शोभा ओझा, अभय तिवारी, आनंद अहिरवार सरीखे नेताओं को भी मिल गया। उनकी सेवाओं के प्रतिसाद के रूप में उन्हें क्रमश: महिला आयोग, युवा आयोग और अनुसूचित जाति कल्याण आयोग की कमान सौंपी गई है। कुछेक की लॉटरी मध्यप्रदेश पीएससी के मैंबर के रूप में मिली है। यह साफ दर्शाता है कि नाथ खुद भले संकट में हों लेकिन वह लोगों को उनकी सेवाओं का प्रतिफल देने में जरा भी देरी नहीं करते। तबादलों के साथ सियासी अदावत में उलझे नेताओं के खिलाफ मुकदमे दायर करने में भी वह देरी नहीं कर रहे। फिर चाहे वह ज्योतिरादित्य सिंधिया हों या नरोत्तम को घेरने के लिए वरिष्ठ आईएएस राधेश्याम जुलानियां हों।
राजनीतिक मोर्चे पर भी मुस्तैद: सिंधिया समर्थक सहित 22 कांग्रेस विधायकों की बगावत झेलते प्रदेश में सभी जानते हैं कि प्रदेश में नाथ सरकार नंबर के गेम में काफी पिछड़ चुकी है। खासतौर से 22 में से 6 मंत्रियों की बर्खास्तगी और भाजपा व्दारा 107 में से 106 की परेड कराने के बाद तो बाद सपा बसपा और निर्दलीयों की संख्या जोडऩे पर भी नाथ सरकार का आंकड़ा सैकड़ा को पार करता नहीं दिख रहा। लेकिन नाथ का कॉन्फिडेंस देखिए वह यह कतई मानने को तैयार नहीं हैं कि बैंगलूरु में बैठे 16 विधायकों में से कुछ न कुछ उनके साथ नहीं आएंगे। 16 विधायकों के इस्तीफे उन्होंने इसीलिए रोक भी रखे हैं। उल्टे नाथ केंप और दिग्गी केंप से यह बात लगातार छनकर लीक की जा रही हैं कि भाजपा के छह विधायक भी कांग्रेस के संपर्क में हैं। अभी तो जिन दो (नारायण त्रिपाठी और शरद कोल) से बात शुरू हुई थी, लेकिन अभी तक तो संशय सिर्फ त्रिपाठी को लेकर है। लेकिन कांग्रेस ने उन भाजपा विधायकों पर फोकस करके रखा है जो मूलत: भाजपाई नहीं थे। कांग्रेस या किसी और दल से जाकर भगवाधारी हुए हैं।
राजभवन के तीखे तेवर और राज्यपाल लालजी टंटन से टकराव के बीच सुप्रीम कोर्ट की याचिका पर होने वाले फैसले तथा कांग्रेस के बागियों की राजभवन में परेड की अटकलों के बावजूद सरकार डटी है। 26 मार्च को राज्यसभा चुनाव होने तक सरकार और दिग्गीराजा की फ्लोर टेस्ट टालने की रणनीति कितनी कामयाब होगी , लेकिन यह तय है कि कमलनाथ एक बड़े योद्धा के रूप में दिखाई दे रहे हैं। अपने कारोबारी पृष्ठभूमि वाले नेता से बिल्कुल विपरीत।

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