दिग्गी और नाथ की जोड़ी जय और वीरू जैसी

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प्रसंगवश:राजेश सिरोठिया


‘ऐ दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे, तोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ न छोड़ेंगे’ सत्तर के दशक की सबसे मशहूर फिल्म शोले के इस गाने को जय यानि अमिताभ बच्चन और वीरू यानि धर्मेद्र पर फिल्माया गया था। मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सियासत के संदर्भ में देखें तो कमलनाथ भी जय की तरह वीरू का साथ निभाते दिख रहे हैं। उन्हें अपनी सरकार पर गहराए संकट से ज्यादा चिंता इस बात की है कि दिग्विजय सिंह बिना किसी रोक टोक के दूसरी बार राज्यसभा के लिए निर्वाचित हो जाएं। उन्हें आशंका है कि यदि 26 को होने वाली राज्यसभा की वोटिंग के पहले सरकार गिरी तो कहीं कांग्रेस में और बढ़ी भगदड़ न मच जाए। उधर भाजपा को लग रहा है कि भगदड़ मची तो वह एक और दो तो क्या तीनों सीटें उसकी झोली में आ जाएं। इसलिए नाथ के जतन 26 तक फ्लोर टेस्ट टालने के और शाह एंड कंपनी की कोशिश 26 के पहले ही फ्लोर टेस्ट कराके अल्पमत सरकार को गिराने की है।
सच पूछा जाए तो सूबे में सारा सियासी संकट राज्यसभा सीट के चक्कर में उलझा है। राज्यसभा चुनाव के लिए अधिसूचना जारी होने के बाद मैंने लिखा था कि भाजपा किसी भी सूरत में दो राज्यसभा सीटें जीतना चाहती है, जबकि उसके पास विधानसभा में जो विधायक बल है उसके मुताबिक एक प्रत्याशी को जिताने के लिए 57 वोट खर्च करने के बाद 50 सीटें बेकार ही बच रही थीं। इसलिए मोदी-शाह चाहते हैं कि दूसरी सीट के लिए प्रयास किया जाए। जबकि कांग्रेस के पास दो सीटें जिताने लायक पर्याप्त नंबर (115)थे। भाजपा के गणित को पूरा करने के लिए तीन निर्दलियों और सपा बसपा के तीन विधायकों के समर्थन के प्रयास करने का मौका ।
सारा कुछ कांग्रेस के पक्ष में आसानी से हो सकता था यदि कांग्रेस आलाकमान लोकसभा चुनाव में हारे ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह को चुनाव घोषित होते ही अपना उम्मीदवार घोषित कर देती। लेकिन जब यह होता नहीं दिखा तो दोनों के समर्थकों ने दवाब बनाना शुरू किया। पहले राजा के समर्थक फूफा जी बने। तय स्क्रिप्ट के मुताबिक फूफा मान भी गए। लेकिन यहीं से डर मौत का नहीं मौत के घर देखने जैसी बात हो गई। नूरा कुश्ती कब असली जंग में तब्दील हो गई किसकी को पता ही नहीं चला और नाथ सरकार गहरे संकट में फंस गई। लेकिन कमलनाथ शोले के जय की तरह वीरू के लिए और वीरू नाथ के लिए डटे हुए हैं। अंदरखानों की माने तो कई कनखजूरों ने नाथ साब को समझाने की कोशिश की कि उनकी सरकार वीरू के फेर में ही संकट में फंसी है, लेकिन जय मानने को तैयार नहीं हैं। उनकी जिद है कि भले उनकी सरकार चले जाए पर वीरू को राज्यसभा में पहुंचाकर ही दम लेगी। जय और वीरू के इस प्रेमालाप में कांग्रेस के दूसरे प्रत्याशी फूल सिंह बरैया की तो कोई सुध ही नहीं ले रहा। उनकी हालत शोले के ठाकुर की तरह हो गई है। कहा गया था कि कि उनको सिंधिया के खिलाफ ग्वालियर चंबल संभाग में संभावित उप चुनावों में सिंधिया समर्थक प्रत्याशियों के खिलाफ दलित कार्ड के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा, लेकिन इस सियासी घटनाक्रम के बीच उनको भुला सा दिया है। चिंता है तो सिर्फ वीरू की। सियासत के मौजूदा दौर में जय और वीरू की इस जोड़ी को सलाम करने का मन कर रहा है। वरना संकट में कौन कब साथ छोड़ दे,सियासत इसके उदाहरणों से भरी पड़ी है।

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