आखिर कहां मात खा गए कमलनाथ?

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प्रसंगवश: राजेश सिरोठिया


मुख्यमंत्री के ओहदे से निवृत होने के साथ ही कमलनाथ यह जरूर विचार करना चाहेंगे कि आखिर मोर्चे पर वह मात कैसे खा गए? कांग्रेस के नेता और राष्ट्रीय प्रवक्ता मुकेश नायक कह रहे हैं कि राजा और महाराजा की लड़ाई में कांग्रेस का काम तमाम हो गया। उन्होंने यह भी कहा कि कमलनाथ जी तो बहुत भले इंसान हैं। उन्होंने किसी का कभी बुरा नहीं चाहा लेकिन दिग्गी राजा के फेर में फंसने कारण ही यह हालात बने।


लोग भले कहें कि प्रदेश की जनता को छोकरा दिखाकर डोकरा ब्याह दिया, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस आलाकमान ने जब कमलनाथ को मुख्यमंत्री बहुद सोच समझकर बनाया था। कमलनाथ का अपना गुट भले ही हो लेकिन धड़ों में बंटे मध्यप्रदेश कांग्रेस में वह सबसे ज्यादा स्वीकार्य नेता थे। उन्हें यह सोचकर मुख्यमंत्री बनाया गया था कि चालीस साल के अनुभवी कमलनाथ सभी के बीच सामजस्य बनाकर चलेंगे। मंत्रिमंडल के गठन तक तो सब ठीक था। लेकिन सब जानते हैं कि सारे मंत्री काबीना स्तर के बनाने का फैसला उनका नहीं बल्कि दिग्गीराजा का था। ज्योतिरादित्य सिंधिया चाहते थे कि कमलनाथ उनके साथ तालमेल बनाकर चलें, क्योंकि यदि वह ग्वालियर-चंबल और मालवा में अपने समर्थकों को नहीं जिताते तो कांग्रेस की सरकार कतई नहीं बनती, पर कमलनाथ ने सिंधिया के साथ कभी सहज महसूस नहीं किया।


कई मौकों पर लगा कि वह दिग्गी राजा को भी खास तवज्जो नहीं दे रहे हैं। लेकिन जो दिग्विजय सिंह के सियासी मिजाज को जानते हैं, उन्हें पता है दिग्गीराजा से कोई प्यार कर सकता है। कोई नफरत कर सकता है, लेकिन उनको इग्नोर (उपेक्षा) कोई नहीं कर सकता। इसी के चलते ज्ञात और अज्ञात कारणों से कमलनाथ चाहते हुए भी उनको दूर नहीं रख सके और इसी के चलते सिंधिया से उनकी दूरी बढ़ती गई। दिग्गीराजा की तर्ज पर जब सिंधिया ने नाथ पर प्रेशर बनाने की कोशिश की तो उन्हें झिडक़ दिया गया। सिंधिया को सडक़ पर उतरने की चुनौती दी गई तो सिंधिया ने सरकार को ही सडक़ पर ला दिया। नाथ-दिग्गी की जोड़ी ने कांग्रेस आलाकमान को यही समझाया था कि सिंधिया भाजपा का दामन थामने को बेताब हैं, इसलिए उनको जाने दिया जाए। हमारी जोड़ी सिंधिया खेमे के दो से ज्यादा विधायकों को नहीं टूटने देंगे। जब बाजी हाथ से निकलने लगी तो गांधी परिवार ने यह कहकर किनारा कर लिया कि सारी आग आप दोनों की लगाई है। इसलिए तुम्हीं ने दर्द दिया तुम्हीं दवा देना।

राजनीति के तकाजों को माने तो नाथ और उनके रणनीतिकारों से सबसे बड़ी गल्ती भाजपा के दो विधायकों अधकचरे तरीके से अपने पाले में लाने की हुई। पहला प्रहार करके कांग्रेस ने भाजपा को पलटवार के लिए उकसाया। सही तो यह होता कि यदि शरद कोल और नारायण त्रिपाठी आपके साथ आ गए थे तो दोनों के तुरंत इस्तीफे कराकर उपचुनाव कराते। भाजपा की सीटें घटतीं तो वह कदम आगे बढ़ाने से ठिठकती। विधायकों मंत्रियों से लेकर मीडिया तक संवाद की समस्या तो शुरू से ही थी। लेकिन उनके सिपहसालारों और रणनीतिकार यह अंदाजा लगाने में विफल रहे कि नाथ के पैरों के नीचे से बेहद करीने से चादर खींची जा रही है। कमलनाथ की प्रकृति प्रतिशोध की है ही नहीं। लेकिन कई ऐसे कनखजूरे थे जिन्होंने वक्त है बदलाव के नारे के साथ आई सरकार को बदले और तबादले की सरकार में तब्दील कर दिया। अब जो होना था वह तो हो गया, लेकिन आने वाला वक्त जरूर कमलनाथ को छिंदवाड़ा से बाहर निकलने और सूबे के मिजाज को समझने का मौका दे रहा है। उम्मीद है कि नाथ इस मौके को नहीं गंवाना चाहेंगे।

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