भारी रस्साकशी के बीच बिछी उपचुनावों की दिलचस्प बिसात

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प्रसंगवश: राजेश सिरोठिया


मध्यप्रदेश में 28 सीटों के लिए 3 नवंबर को होने वाले मतदान के लिए कांग्रेस और भाजपा के बीच फंसी चार सीटों पर बेहद रस्साकशी के बाद निकले नामों ने पूरे चुनाव को ही दिलचस्प बना दिया है। चुनाव भले ही 28 सीटों का हो पर बदनावर, मांधाता, बड़ा मलेहरा, मेहगांव, मुरैना और जौरा के चुनावी नतीजे सूबे की सियासत में दूर की कौंड़ी साबित होने वाले हैं।


बड़ा मलहरा में सभी की दावेदारियों को दरकिनार करते कांग्रेस ने साध्वी उमाभारती के प्रत्याशी प्रद्युम्न सिंह लोधी के सामने साध्वी रामसिया भारती को उतारकर मुकाबले को दो साध्वियों के बीच की जंग बना दिया है। साध्वी रामसिया भारती भी उमाभारती की तरह टीकमगढ़ की हैं। पृथ्वीपुर से उनका परिवार कुछ सालों पहले छतरपुर में शिफ्ट हुआ। रामसिया भी छोटे मोटे प्रवचन करतीं हैं। वह बीते कई सालों से कांग्रेस का टिकट मांग रहीं थी। लेकिन इस बार तिलक लोधी, मंजुला देवडिय़ा और अजय यादव की दावेदारी को दरकिनार करते हुए उनका नाम अचानक सामने आ गया। चूंकि कांग्रेस और विधायकी को उमा के कहने पर तिलांजलि देकर प्रद्युम्न लोधी भाजपा से भाग्य आजमाने आए हैं। इसलिए रामसिया के सामने दांव पर प्रद्युम्न नहीं उमाभारती होंगी। गौरतलब है कि जब उमा भारती जब भाजपा से निष्काष्ति होने के बाद राम रोटी यात्रा पर निकलीं थी तब प्रद्युम्न लोधी उनकी यात्रा के संयोजन सूत्र संभाल रहे थे।


मेहगांव की सीट पर कमलनाथ के सर्वे में भाजपा प्रत्याशी और लोनिव मंत्री ओपीएस भदौरिया के खिलाफ सबसे सशक्त दावेदार चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी थे। लेकिन जिन कारणों के चलते 2013 के विधानसभा चुनाव के पहले चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी को विधानसभा में उपनेता प्रतिपक्ष होते हुए कांग्रेस छोडक़र भाजपा का दामन थामना पड़ा था, उन्हीं कारकों के चलते चतुर्वेदी को कांग्रेस कांग्रेस में वापसी के बाद मुख्यधारा में लौटने के मौके से वंचित होना पड़ा। दिग्विजय सिंह, अजय सिंह और डा. गोविंद सिंह के वीटो के चलते राकेश का पत्ता कट गया। मेहगांव सीट पर राकेश सिंह की संभावनाएं सबसे उजली इसीलिए थी क्यों जातिगत समीकरण उनके पक्ष में थे। ब्राह्मणों के साथ ही वह मेहगांव के कुशवाह समाज के ठाकुरों के बीच गहरी पैठ रखते हैं। अब अटेर से विधायक रहे और 2018 का चुनाव हारे हेमंत कटारे को मेहगांव से टिकट देना उनके लिए मौके से ज्यादा खतरे की घंटी ज्यादा नजर आ रहा है। कटारे यहां से कामयाब नहीं हुए तो अगले चुनाव में उनका यह कहते हुए पत्ता काटने की कोशिश होगी कि वह लगातार दो चुनाव हार चुके हैं। जाहिर है कि कटारे अब तलवार की धार पर हैं और ओपीएल भदौरिया को राकेश सिंह के मैदान में नहीं होने से राहत महसूस हो रही है। डा. गोविंद सिंह के भांजे राहुल भदौरिया को टिकट नहीं मिलना भी ओपीएस के लिए सकून की बात है।


बदनावर का चुनाव भी बेहद अहम चुनाव माना जाएगा। यहां पर राज्यवर्धन सिंह दत्तीगांव के मुकाबले दिग्गी समर्थक अभिषेक सिंह उर्फ बंटी बना का टिकट कटवाकर और अपने समर्थक कमल सिंह पटैल को टिकट दिलाकर धार जिले के धाकड़ आदिवासी विधायक उमंग सिंघार ने एक बार फिर दिग्विजय सिंह को सीधी चुनौती दी है। लेकिन उधर मांधाता सीट पर दिग्गी राजा ने अपने पुराने साथी राजनारायण सिंह पूर्णी के बेचे उत्तमपाल सिंह और हाट पीपल्या में राजेंद्र सिंह बघेल के बेटे को टिकट दिलाकर नई पीढ़ी को मौका दिया है। यह बात अलग है कि अरूण यादव को मांधाता में दिग्गीराजा का दखल कितना रास आता है?


इसी तरह मुरैना में कांग्रेस ने माधव राव सिंधिया के पुराने साथी और धाकड़ विधायक सोबरन सिंह मावई के बेटे राकेश मावई पर दांव खेला है तो जौरा में कांग्रेस के सशक्त दावेदार सुनील शर्मा की जगह पंकज उपाध्याय को टिकट देकर जो खतरनाक दांव खेला था, उसे भाजपा ने पूर्व विधायक सूबेदार सिंह राजौधा को टिकट देकर राहत दे दी है। राजौधा पिछले चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे थे। उनके नाम का भाजपा में भारी विरोध था। लेकिन अब वहां बसपा प्रत्याशी के साथ जौरा का मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है।

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