38 साल बाद भी नहीं हो सका भोपाल गैस पीड़ितों के हितों का फैसला

भोपाल। विश्व की बड़ी औद्योगिक दुर्घटनाओं में शामिल भोपाल गैस त्रासदी हो या फिर दतिया जिले की सिंध नदी के पुल पर भगदड़ और झाबुआ के पेटलावद में विस्फोट से 90 से ज्यादा लोगों की मौत। आयोग गठित हुए, जांच हुई, रिपोर्ट विधानसभा पटल पर रखी और सरकार कार्रवाई करना भूल गई। ऐसे एक दर्जन से ज्यादा मामले हैं। जिनमें पीड़ितों को अब भी न्याय का इंतजार है और विभिन्न् आयोग की फाइलें अलमारियों में कैद होकर रह गई हैं।

भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से 38 साल पहले जहरीली गैस रिसी थी, जिससे हजारों लोगों की मौत हुई थी। मामले की जांच के लिए अगस्त 2010 में न्यायमूर्ति एसएल कोचर की अध्यक्षता में आयोग गठित हुआ। जांच शुरू हुई। फरवरी 2015 को आयोग ने यह रिपोर्ट शासन को सौंप दी।

तब से अब तक गैस राहत विभाग इस रिपोर्ट पर मंथन कर रहा है। मामले में आयोग की रिपोर्ट तक पूरी तरह से सामने नहीं आई। यह इकलौता मामला नहीं है। एक दर्जन से ज्यादा गंभीर घटनाओं में सरकार की कार्रवाई ऐसी ही चल रही है। इन सभी मामलों में संबंधित आयोग अपनी रिपोर्ट शासन को सौंप चुके हैं। कई मामलों की रिपोर्ट विधानसभा पटल पर रखी जा चुकी है पर कार्रवाई का इंतजार अब भी है।

मामले उछलते और ठंडे पड़ जाते हैं

इनमें से कुछ मामले राजनीतिक जरूरत का विषय हैं। इसलिए मौके-मौके पर उठते रहते हैं। विपक्ष जब मामला उठाता है, कुछ दिन चर्चा चलती हैं। अलमारी खुलती है, कैद फाइलों को रोशनी देखने को मिलती है और चंद दिनों में मामला ठंडा पड़ जाता है। आखिर फाइलें आमतौर पर जहां रहती हैं, वहीं पहुंच जाती हैं।

जांच और प्रतिवेदन तक पहुंचे मामले

– वर्ष 2006 में दतिया जिले के रतनगढ़ देवी मंदिर जाते हुए सिंध नदी के पुल पर भगदड़ से बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई थी। जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सुशील पाण्डेय की अध्यक्षता में अक्टूबर 2006 में आयोग गठित हुआ। जिसने मार्च 2007 में रिपोर्ट सौंप दी। दूसरी घटना अक्टूबर 2013 में हुई थी। इसकी अलग जांच कराई। जुलाई और दिसंबर 2014 में दोनों जांच प्रतिवेदन विधानसभा पटल पर रखे गए।

– सामाजिक सुरक्षा पेंशन, राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन में अनियमित्ताओं की जांच के लिए फरवरी 2008 में सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एनके जैन की अध्यक्षता में आयोग गठित हुआ। आयोग ने सितंबर 2012 को रिपोर्ट सौंप दी। सामाजिक न्याय विभाग इस पर अब भी मंथन कर रहा है।

– झाबुआ जिले के पेटलावद में सितंबर 2015 में चाय की गुमठी में गैस सिलेंडर फटने से 90 लोगों की मौत हुई थी। घटना के तीन दिन बाद सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति आर्येन्द्र कुमार सक्सेना को जांच सौंपी गई। उन्होंने दिसंबर 2015 में रिपोर्ट सौंप दी, जो अप्रैल 2016 से गृह विभाग में है।

– भोपाल केंद्रीय जेल से आठ कैदियों के भागने की जांच नवंबर 2016 में सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एसके पाण्डे को सौंपी गई। उन्होंने अगस्त 2017 में रिपोर्ट सौंप दी। जून 2018 में प्रतिवेदन विधानसभा पटल पर रखा जा चुका है।

– मंदसौर के पिपल्यामंडी में किसान आंदोलन के दौरान जून 2017 में पुलिस की गोली से पांच किसानों की मौत के मामले की जांच सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति जेके जैन को सौंपी थी। उन्होंने जून 2018 में रिपोर्ट सौंप दी। जिसे तुरंत कार्रवाई के लिए गृह विभाग को भेज दी गई। तब से वहीं पड़ी है।

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