“वोक फेस्टिवल” और सांस्कृतिक अवमूल्यन का बढ़ता खतरा

“वोक फेस्टिवल” और सांस्कृतिक अवमूल्यन का बढ़ता खतरा
भोपाल फिल्म फेस्टिवल : ‘वोक’ संस्कृति, वैचारिक सबवर्शन और भारतीय समाज पर गहरा खतरा

भोपाल फिल्म फेस्टिवल को लेकर उठे विवाद केवल किसी आयोजन की नीति-समीक्षा भर नहीं हैं, बल्कि यह प्रश्न भारतीय समाज, संस्कृति, परिवार और युवाओं के मनोविज्ञान की दिशा से जुड़ा हुआ है। विडंबना यह है कि जिस आयोजन का सह-प्रस्तुतिकरण मध्यप्रदेश पर्यटन जैसे सरकारी संस्थान ने किया, वही आयोजन उन फिल्मों और व्यक्तियों के लिए मंच बन गया है जो लगातार भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के विरोध में वैचारिक अभियान चलाते रहे हैं। यह अकेला उदाहरण नहीं है; पिछले कई वर्षों से ‘वोक’ और ‘प्रगतिशील’ नामों की आड़ में ऐसे कार्यक्रमों का मकसद समाज की मूल संरचना को धीरे-धीरे बदलना, भ्रमित करना और एक नई मानसिकता को नॉर्मल के रूप में स्थापित करना होता है।
फेस्टिवल में प्रस्तुत फिल्मों—Kiss (2022), Kuchur (The Itch) और अन्य चयनित शीर्षकों—की मूल थीम LGBTQ विचारधारा, किशोर यौन-मन और आनंद की अवधारणा को एक विशेष वैचारिक ढांचे में प्रस्तुत करना थी। Varun Grover जैसे निर्देशक, जो लंबे समय से वामपंथी विचारधारा का प्रचार करते रहे हैं और सरकार, भाजपा तथा आरएसएस पर खुली टिप्पणियों के लिए प्रसिद्ध हैं, ऐसे आयोजनों में विशेष स्थान पाते हैं। प्रश्न है: क्या करदाताओं के पैसे से ऐसे आयोजनों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए जो खुले तौर पर भारतीय समाज व राष्ट्रवादी विमर्श का विरोध करते हों?

वोकिज़्म की वैचारिक जड़ें : सांस्कृतिक मार्क्सवाद की नई शाखा
वोक विचारधारा को केवल एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में देखना भूल होगी। यह सांस्कृतिक मार्क्सवाद के आधुनिक स्वरूप का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य समाज की पारंपरिक इकाइयों—परिवार, धर्म, संस्कृति, पुरुष–स्त्री संबंध, नैतिकता और सामाजिक अनुशासन—को तोड़ना है।
वोकिज़्म व्यक्ति को परिवार से बड़ा बनाता है, इच्छा को मर्यादा से ऊपर रखता है और आनंद (pleasure) को मूल मूल्य के रूप में स्थापित करता है।
फिल्में इसी दिशा में सबसे प्रभावी माध्यम हैं, क्योंकि वे कथा, भावनाओं, कला और “स्वतंत्रता” के नाम पर संवेदनशील विषयों को सामान्य बना देती हैं।

युवाओं के मन पर प्रभाव : वोक सिनेमा का मनोवैज्ञानिक आयाम
किशोरावस्था किसी भी मनुष्य के जीवन का अत्यंत संवेदनशील चरण है। इस उम्र में दिखाए गए कथानक उनके मन में स्थायी प्रभाव छोड़ते हैं।
‘Kiss’ (2022) फिल्म में दो किशोर लड़कों के बीच हुए चुंबन को कहानी का केंद्र बनाना LGBTQ अवधारणा की तरफ प्रविष्टि का सीधा माध्यम है। दूसरी ओर Kuchur (The Itch) जैसी फिल्में एक किशोरी के “female pleasure” और हस्तमैथुन को सामान्य और सहज प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करती हैं।
यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है कि कला के नाम पर किशोरों के मनोविज्ञान को किस दिशा में ले जाया जा रहा है?
क्या यह उनकी जिज्ञासाओं का मार्गदर्शन है या उन्हें यौनिक प्रयोगवाद की ओर धकेलना?

सामाजिक विकृतियों का सामान्यीकरण : भारतीय जीवन-मूल्यों से द्रोह

आज जिस प्रकार “कला”, “स्वतंत्रता” और “अभिव्यक्ति” के नाम पर सामाजिक विकृतियों को सामान्य किया जा रहा है, वह केवल एक सांस्कृतिक भ्रम नहीं बल्कि भारतीय जीवन-मूल्यों के साथ सीधा द्रोह है। भारतीय चिंतन में कामना, संबंध और यौन व्यवहार को हमेशा जिम्मेदारी, संयम और सामाजिक संतुलन के साथ जोड़ा गया है। किंतु वोक विचारधारा इन संवेदनशील विषयों को किशोरावस्था में ही उन्मुक्त प्रयोग का क्षेत्र बनाकर न केवल परंपरागत नैतिकता पर आघात करती है, बल्कि मनुष्य के भावनात्मक और मानसिक विकास को भी अव्यवस्थित कर देती है। किशोरों की यौन जिज्ञासाओं को ‘स्वतंत्रता’ बताना और परिवार, मर्यादा, संस्कार को ‘दमनकारी संरचना’ घोषित करना, वस्तुतः समाज को उसकी धुरी से हटाने का प्रयास है। यह प्रक्रिया व्यक्ति को परिवार से, समाज से और अंततः अपनी सांस्कृतिक पहचान से काट देती है। सामाजिक विकृतियों का यह सामान्यीकरण उस गहरी वैचारिक रणनीति का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य पीढ़ियों को मूल्यविहीन बनाना और उपभोक्तावाद, व्यक्तिवाद तथा वाम-उदारवादी मताग्रह की प्रयोगशाला में ढालना है। अतः ऐसे आयोजनों का प्रश्न कला का नहीं—समाज के सांस्कृतिक भविष्य का है।

मीडिया नैरेटिव बनाम सांस्कृतिक राष्ट्रीयता का युगधर्म
मीडिया का एक बड़ा वर्ग ऐसी फिल्मों व आयोजनों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मानवाधिकार और ‘प्रगतिशीलता’ का प्रतीक बताता है। परंतु राष्ट्रीय दृष्टि पूछती है— क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ सामाजिक अराजकता है?
क्या कला का दायित्व समाज निर्माण है या समाज विघटन?
मीडिया नैरेटिव इस विमर्श को इस तरह प्रस्तुत करता है कि जैसे परंपरावादी या राष्ट्रवादी वर्ग “अभिव्यक्ति का विरोध” कर रहा हो। जबकि वास्तविक संघर्ष विचारधारा बनाम विचारधारा का है— एक ओर हजारों वर्षों की सभ्यता आधारित संस्कृति, दूसरी ओर पश्चिम प्रेरित ‘वोक प्रयोगशाला’।

क्यों यह मुद्दा महज एक फिल्म फेस्टिवल का नहीं है?
क्योंकि यह प्रश्न सीधे-सीधे यह तय करेगा कि—
* हमारे बच्चे किस मानसिकता के साथ बड़े होंगे,
* परिवार संस्था का भविष्य क्या होगा,
* समाज नैतिकता व मर्यादाओं को कितना महत्व देगा,
* और भारत की सांस्कृतिक आत्मा अगले वर्षों में कैसे विकसित होगी।
यदि राज्य सरकारें, विश्वविद्यालय, मेडिकल कॉलेज और पर्यटन विभाग जैसे संस्थान भी वैचारिक प्रयोगशालाओं में परिवर्तित हो जाएँ, तब यह केवल कला का विषय नहीं रह जाता—यह सांस्कृतिक सुरक्षा का विषय बन जाता है।

सांस्कृतिक आत्मरक्षा का समय
भोपाल फिल्म फेस्टिवल एक केस स्टडी है कि कैसे वोक एजेंडा सरकारी संरक्षण, कलात्मक आवरण और मीडिया नैरेटिव के सहारे समाज के भीतर स्थान बनाने की कोशिश करता है। भारत काठ की तलवारों वाला राष्ट्र नहीं; यह हजारों वर्षों की सांस्कृतिक दृढ़ता वाला देश है। लेकिन दृढ़ता तभी टिकती है जब समाज अगले वैचारिक आक्रमणों को पहचान सके। इसलिए आवश्यक है कि—
* कला को वैचारिक हथियार बनने से रोका जाए,
* करदाता के पैसे का उपयोग सांस्कृतिक विघटन के लिए न हो,
* और समाज यह समझे कि “वोकिज़्म” केवल एक फैशन नहीं, एक पूर्ण राजनीतिक-सांस्कृतिक आंदोलन है।
भारत को भारत रहना है, बनाये रखना है अथवा भावी पीढ़ी का भविष्य तभी सुरक्षित रह सकता है जब यहां का ” हम भारत के लोग” – का जन गण मन जागृत होगा, परिवर्तन के लिये तत्पर होगा तभी यहाँ कि समाज और राष्ट्र अपने सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा स्वयं करेगा।
— कैलाश चन्द्र

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles