वैशाख अमावस्या को क्यों कहा जाता है ‘सतुवाई अमावस्या

वैशाख अमावस्या को क्यों कहा जाता है ‘सतुवाई अमावस्या
वैशाख महीने की अमावस्या का बहुत बड़ा धार्मिक महत्व है। इस दिन को कई क्षेत्रों में सतुवाई अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस तिथि पर स्नान, दान और पितृ तर्पण का विधान तो है ही, लेकिन इस दिन सत्तू का विशेष उपयोग इसे दूसरी अमावस्याओं से अलग बनाता है।

क्यों पड़ा सतुवाई अमावस्या नाम?
वैशाख अमावस्या को सतुवाई अमावस्या कहने के पीछे की मुख्य वजह इस दिन सत्तू का दान और सेवन है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वैशाख के महीने में गर्मी अपने चरम पर होती है। सत्तू की प्रकृति शीतल मानी गई है, जो शरीर को ठंडक देती है। ऐसे में इस दिन सत्तू खाने और दान करने की परंपरा बनाई गई, ताकि लोगों को इसके लाभ मिल सके।

महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, वैशाख अमावस्या के दिन ही त्रेता युग का आरंभ हुआ था। इस दिन पितरों की आत्मा की शांति के लिए जल से भरा घड़ा, सत्तू, गुड़ और मौसमी फलों का दान करना अक्षय पुण्य प्रदान करता है। कहा जाता है कि इस दिन किया गया दान सीधे पितरों तक पहुंचता है और उनकी आत्मा तृप्त होती है। वहीं, इस दिन भगवान विष्णु के अवतारों की पूजा के साथ-साथ सत्तू का भोग लगाया जाता है। सत्तू को दरिद्र का भोजन भी कहा जाता है, इसलिए इसे दान करने से अहंकार का नाश होता है और जीवन में सुख-शांति आती है।

पौराणिक कथा
प्राचीन काल में धर्मवर्ण नाम के एक ब्राह्मण थे। उन्होंने अपना सारा जीवन वेदों के अध्ययन और परोपकार में लगा दिया था। एक बार वे एक ऐसे स्थान पर पहुंचे जहां उनके पितृ कष्ट में थे। पितरों ने धर्मवर्ण को बताया कि उनकी मुक्ति तभी संभव है, जब वह वैशाख अमावस्या के दिन विधि-विधान से दान और तर्पण करें। पितरों की आज्ञा पाकर धर्मवर्ण ने वैशाख अमावस्या के दिन व्रत रखा और भीषण गर्मी में प्यासे लोगों के लिए जल के घड़े भरवाए। साथ ही, उन्होंने सत्तू, गुड़ और फल का दान किया। इस दान के प्रभाव से उनके पितरों को मुक्ति मिल गई। तभी से इस दिन सत्तू के दान और सेवन की परंपरा शुरू हुई।

कैसे मनाएं सतुवाई अमावस्या?
सुबह पवित्र नदी में स्नान करें और सूर्य देव को जल अर्पित करें।
जल से भरे मिट्टी के घड़े के ऊपर सत्तू रखकर किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान करें।
पितरों के नाम से सत्तू और तिल का तर्पण करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।

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