अब तक छप्पन… मोदी का सीना, राहुल की उम्र और राजनीति का भ्रम!

व्यू पॉइंट : राजेश सिरोठिया

भारतीय राजनीति में प्रतीकों का बड़ा महत्व है। कभी “56 इंच का सीना” चुनावी विमर्श का सबसे चर्चित नारा बन जाता है तो कभी किसी नेता की उम्र और शारीरिक सक्रियता राजनीतिक बहस का विषय बना दी जाती है। कांग्रेस वर्षों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “56 इंच के सीने” पर तंज कसती रही है। संयोग देखिए कि अब राहुल गांधी की 56वीं वर्षगांठ पर उनके समर्थक उसी संख्या को राजनीतिक प्रतीक बनाने की कोशिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर उनके व्यायाम और शारीरिक फिटनेस की तस्वीरों के जरिए यह संदेश देने का प्रयास हो रहा है कि वे मोदी को चुनौती देने के लिए तैयार हैं।

लेकिन क्या किसी राष्ट्र का भविष्य नेताओं के डोले-शोले या सीने की चौड़ाई से तय होता है?

इतिहास इसका उत्तर ‘नहीं’ में देता है। राष्ट्र न तो मांसपेशियों से चलते हैं और न ही नारों से। वे चलते हैं नीति, नीयत, दूरदृष्टि और निर्णय क्षमता से।

दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को भी ईरान संकट के दौरान यह समझना पड़ा कि केवल सैन्य शक्ति हर समस्या का समाधान नहीं होती। अंततः कूटनीति, विवेक और राष्ट्रीय हित ही निर्णायक साबित होते हैं। यही बात भारत की राजनीति पर भी लागू होती है।

राहुल गांधी यदि स्वयं को प्रधानमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार मानते हैं तो उन्हें यह भ्रम छोड़ना होगा कि केवल आक्रामक भाषण, शारीरिक फिटनेस या मोदी विरोध ही उन्हें जनता का विश्वास दिला देगा। देश वैकल्पिक नेतृत्व में स्पष्ट दृष्टि, ठोस नीतियां और भरोसेमंद राजनीतिक परिपक्वता तलाशता है।

उधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी केवल पुराने नारों और व्यक्तिगत लोकप्रियता के भरोसे आगे बढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। लोकतंत्र में हर सरकार का मूल्यांकन उसके काम, नीतियों और परिणामों से होता है।

मैं यह भी स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मेरी दृष्टि न तो तथाकथित ‘गोदी मीडिया’ से प्रभावित है और न ही उस प्रवृत्ति से जो हर राष्ट्रीय मुद्दे को भारत-विरोधी नैरेटिव में ढालने वाली लोधी मेढ़ी प्रयास करती है। पत्रकारिता का धर्म किसी राजनीतिक खेमे की वकालत करना नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी जवाबदेही निभाना है।

भारत एक उदार, लोकतांत्रिक और सहिष्णु सभ्यता है। इस देश ने सदियों तक अनेक प्रकार की चुनौतियाँ और आक्रमण झेले हैं। आज भी वैचारिक विभाजन, राजनीतिक ध्रुवीकरण और समाज को बाँटने वाले प्रयास हमारे सामने हैं। ऐसे समय में पत्रकार का दायित्व केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज को सचेत करना भी है।

मुझे पता है कि इस रास्ते पर न सत्ता पक्ष से तालियाँ मिलेंगी और न विपक्ष से। लेकिन यदि पत्रकार केवल प्रशंसा पाने के लिए लिखने लगे तो वह अपने पेशे के साथ न्याय नहीं कर सकता।

मेरी प्रतिबद्धता किसी दल के प्रति नहीं, बल्कि भारत के प्रति है। मेरा विश्वास है कि एक मजबूत राष्ट्र व्यक्ति-पूजा से नहीं, बल्कि मजबूत संस्थाओं, जिम्मेदार राजनीति और जागरूक नागरिकों से बनता है।

मेरी यह यात्रा आगे भी जारी रहेगी।

वंदे मातरम्।जय हिन्द।जय भारत।

जो इस विचार से सहमत हैं, वे साथ चलें; और जिनकी राह अलग है, वे भी भारत के हित को सर्वोपरि रखें।

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