ओडिशा के पूर्व सीएम बीजू पटनायाक ने इंडोनेशिया में पीएम मोदी की तारीफ

ओडिशा के पूर्व सीएम बीजू पटनायाक ने इंडोनेशिया में पीएम मोदी की तारीफ
इंडोनेशिया दौरे पर पहुंचे प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक की जमकर तारीफ की है. उन्होंने कहा है कि देश की आजादी के लड़ाई के दौरान डच कब्जे वाले जावा से इंडोनेशियाई नेताओं को सुरक्षित निकालने में पटनायक का अहम रोल रहा.

पीएम मोदी ने कहा कि पटनायक एक पायलट थे. उन्होंने देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री सुल्तान शहरिर और उपराष्ट्रपति मोहम्मद हट्टा को सुरक्षित भारत पहुंचाया था. इससे भारत और इंडोनेशिया के बीच नजदीकी बढ़ी.

उन्होंने कहा कि हमारे दोनों देशों को लगभग एक ही समय में आजादी मिली. इंडोनेशिया को 1945 में और भारत को 1947 में. जब आजाद देशों के तौर पर संप्रुभता की बात आई तो भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इंडोनेशिया के आजादी के आंदोलन का मजबूती से समर्थन किया. इस दौरान में सम्मानित बीजू पटनायक ने भूमिका निभाई थी. इस तरह से उन्होंने पीएम सुल्तान शहरिर और उपराष्ट्रपति मोहम्मद हट्टा को सुरक्षित भारत पहुंचाया. उससे दोनों देश और करीब आए. .

पीएम मोदी ने किस घटनाक्रम का किया जिक्र
दरअसल, बात 1947 की है. यहां डच औपनिवेशिक शासन के खिलाफ इंडोनिशयाई राष्ट्रीय क्रांति में जान जोखिम में डालकर बीजू पटनायक ने एक अहम भूमिका निभाई थी. उन्होंने नेहरू के अनुरोध पर डच लोगों की घेराबंदी को तोड़ते हुए इंडोनेशिया के शीर्ष विद्रोही नेताओं को बचाया. उनकी आजादी की लड़ाई की ओर दुनिया का ध्यान खींचा. बात सेकंड वर्ल्ड वॉर के वक्त की है. जब डच लोगों ने इंडोनेशिया पर फिर से कब्जा करने की कोशिश की थी. एक बड़ा सैन्य हमला किया था.

उन्होंने आजादी के आंदोलन को दबाने के लिए इंडोनेशियाई पीएम सुल्तान शहरिर और वाइस प्रेसीडेंट मोहम्मद हट्टा को जकार्ता में नजरबंद कर दिया था. साथ ही बाहर निकलने के सभी रास्ते बंद कर दिए. तब नेहरू ने 31 साल के पटनायक को नेताओं के बाहर निकालने के लिए एक सीक्रेट मिशन पर भेजा. ताकि डच लोगों के खिलाफ इंटरनेशनल लेवल पर माहौल बना सकें.

बीजू पटनायक के साथ उनकी पत्नी भी थीं साथ
जुलाई 1947 में बीजू पटनायक और उनकी को पायलट जो उनकी पत्नी भी थी ज्ञानवती पटनायक ने डगलस सी-47 सेना का विमान को भारत से इंडोनेशियाई हवाई क्षेत्र में उड़ाया. इसपर डच लोगों की तरफ से विमान को मार गिराने की धमकी दी. इसके जवाब में पटनायक ने कहा कि किसी भी हमले का नतीजा यह होगा कि बदले में भारतीय आसमान में डच विमानों को निशाना बनाया जाएगा. इसके बाद सफलतापूर्वक शजरिर और हट्टा को सिंगापुर के रास्ते देश से बाहर निकाला. 24 जुलाई 1947 को सुरक्षित नई दिल्ली पहुंच गए थे.

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