प्रसंगवश: राजेश सिरोठिया
आनाकानी भरे रवैये और उपचुनाव टालने की तमाम कोशिशों के बावजूद मध्यप्रदेश में खंडवा लोकसभा और जोबट, पृथ्वीपुर तथा रैगांव विधानसभा के चुनाव सिर पर आ ही गए। इन चुनावों के नतीजों से न तो केंद्र की मोदी सरकार की सेहत पर कोई फर्क पडऩे वाला है और न मध्यप्रदेश की भाजपा की सरकार के स्थायित्व को कोई खतरा पैदा होने वाला है। जोबट और पृथ्वीपुर विधानसभा सीट कांग्रेसी विधायकों के निधन से रिक्त हुई थी तो रैगांव और खंडवा लोस सीट भाजपा के कब्जे में थी। इसके बावजूद यह चुनाव मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए बड़े इम्तिहान का सबब बन गया है।
शिवराज सिंह चौहान की हसरत है कि वह चारों सीटों पर कब्जा करके केंद्र और राज्य में अपने विरोधियों को बताना और जताना चाहते हैं कि तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद सूबे में उनका जादू बरकरार है। लेकिन धरातल की हकीकत सभी को परेशान कर रही है। धरातल पर मंहगाई और बेरोजगारी तथा बढ़ते खर्चों और घटती आमदनी के चलते मतदाताओं के मन में कड़वाहट घुली हुई है। मंहगाई में लोगों की सबसे ज्यादा मुसीबत पेट्रोल, डीजल और घरेलू गैस की कीमतों को लेकर है जो केंद्र सरकार से जुड़े विषय हैं।
मोदी जी के राष्ट्रवाद के नाम पर लोग तो कलेजे पर हाथ रखकर रह जाते हैं। लेकिन एक-एक दो-दो रूपए के लिए दुकानदारों से सौदेबाजी करने वाले महिला वर्ग को गैस सिलेंडरों की कीमत का उछाल रास नहीं आ रहा है। यानि मामला बिल्कुल साफ है। लोग त्रस्त केंद्र की डीजल पैट्रोल गैस सिलेंडर पर टेक्स कम नहीं करने से हैं लेकिन दांव पर शिवराज सिंह चौहान की इज्जत है। लोगों को पता है कि इन उपचुनावों के नतीजों से मोदी और भाजपा का कुछ बिगडऩे वाला नहीं है इसलिए उनकी मनमर्जी भरी रीति नीति के लिए झटका दिया जाए। मतदाताओं के इसी मूड के चलते कांग्रेस ने छाती चौड़ी कर रखी है। उसे पता है कि इस दो दलीय व्यवस्था वाले राज्य में भाजपा को सबक सिखाने वाले वोट उसके ही पाले में पड़ेंगे।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को दमोह की हार के बाद तो सदमा नहीं लगा था, क्योंकि वहां का चुनाव भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं था। दमोह का उपचुनाव भाजपा प्रत्याशी बनाम आम जनता का चुनाव बन गया था। जातिवाद के खिलाफ वोट डाले थे। दमोह की जीत से उत्साहित कांग्रेस चारों सीटों पर दमोह जैसा भाव यानि भाजपा बनाम जनता बनाना चाहती है। शिवराज को इन हालात का अंदाजा हो चला है, इसी के चलते ही उन्होंने भाजपा के संगठन के साथ-साथ मंत्रियों की टीम को उपचुनावी क्षेत्रों में अभी से झोंक दिया है। उन्होंने खुद उपचुनावों के पहले इन क्षेत्रों में सघन दौरे करके जमकर सरकारी घोषणाएं परोसी है। जनता की नब्ज को छूने की तमाम कोशिशों के बावजूद वह उन मुद्दों का निराकरण नहीं कर सके हैं जिनका निर्णय क्षेत्र केंद्र के अधीन है।
हालांकि शिवराज की जो राजनीतिक तासीर है उसको देखें तो वह इतनी आसानी से घुटने वालों में से नहीं है। वह रूठी जनता को मनाने की कला में माहिर है। बावजूद इसके नतीजे भाजपा के प्रतिकूल रहे तो 2023 के लिए खतरे की घंटी बज जाएगी लेकिन मामला दो-दो की बराबरी पर छूटा तो भी सरकार की फेस सेविंग हो जाएगी। लेकिन भाजपा यदि चारों सीटें हथियाने में कामयाब हो गई तो शिवराज सरकार को 2023 तक कोई खतरा नहीं रहने वाला। कुल मिलाकर महीने भर सूबे के सियासी प्याले में महीने भर जमकर बवाल मचने वाला है।

